Saturday, 25 May 2013

जिजीविषा : मेरी अंतरिम प्रेरणा

समर्पित... तुम्हे... !!
मेरी अंतरिम प्रेरणा

जीवन की दुखद चोटों को को धागे से सीलती,
अनुभवों को बुनती..
तरसती मैं ..
उन हंसते दिनों की याद को ...
उन् मंदिरों में की ... उस फ़रियाद को..
एक साथ को..
गुजरी उस रात को...
मन में ज्वार
उठता सा झंझावात..
कुछ बातें, कुछ जज़्बात,
कुछ यादें और कुछ अलफ़ाज़..
सुनो मुझे...
मैं कुछ कहना चाहती हूँ..

एक शाश्वत सत्य, प्रकृति का उन्माद हूँ मैं ..
हुंकार हूँ ,अज्ञात हूँ एक आवाज़ हूँ मैं...!!


(जिजीविषा)