Saturday, 14 September 2013

हिंदवासिओं का हिंदी दिवस

हिंदी  ..!!
कहाँ छिपी हो तुम ?
सुनो ना ..भूली हुई सी आज याद आ रही हो सबको..
टूटे शीशों से वर्तमान के आईने में देखो ज़रा अपना स्वरुप ..
डर नहीं लगता तुम्हे,
ये कैसा वेश है तुम्हारा, ये भयावह चेहरा ..
तुम्हारा  अस्तित्व,
गुम  गया अपने ही घर में ..
पुनीता से पतीता हो गई हो.
अपने ही समाज में,
तुम भी उन बाँझ स्त्रिओं सी ही हो,
जिन्हें  अपनाया तो लक्ष्मी की  तरह जाता है..
पर बहिष्कृत किया जाता है फलित ना होने पर ..
परम्परावादी परिपाटी पर चलती तुम,
आखिर बंधवा ही गई कोख अपनी ..
एक दिन में सिमटी हुई तुम भूल गई अपना परिचय ..
खैर. ...
संवेदनाओं में ही सही ,
मुबारक हो तुम्हें..
तुम्हारे ही हिंद देश में ,
तुम्हारे ही हिन्द्वासिओं का ,
तुम्हारा ही दिवस,

"हिंदी दिवस"....

१४. ९. २०१३
........प्रज्ञा .........
चित्र :गूगल से साभार
© Pragya Bahuguna

Thursday, 8 August 2013

ईदी

आओ आओ
आ गए तुम..
पर ये चाँद कहाँ निकला है अभी ?
ये चंद रोज़े तो गुजरने देते
रात के ये पहर तो निकलने देते..
रमज़ान का का वास्ता
बड़ी जल्दी मान लिए तुम
खैर
तुम्हारा ही इंतज़ार था

सच कहा था तुमने
बड़े प्यार से ...
"जब कोई इंसान बेपनाह मुहब्बत करता है 
तो नफरत भी कर सकता है
टकरा के जब खूबसूरत शीशा टूटता है
तो एक हथियार बन जाता है"

जो भी है
है काबिले तारीफ..
पर कुछ ना कहेंगे हम
चाहे जितना कोसो
जितना पूछो 
चुप रहेंगे हमेशा की तरह
क्यूंकि
ईदी में फिर अबके बरस हम
रंजिश ही लेंगे तुमसे...

(जिजीविषा ) - ८ अगस्त २०१३ 
चित्र :गूगल से साभार

Friday, 26 July 2013

बस एक पल कभी

चल रहे उन रास्तों पर
मंजिल है अब दूर कहीं
सफर की थकन मिटे
एक पल तो रुको तो कभी..

होश में दुनिया है सारी
महखानों की जाने राजा है क्या
जाम के नशे में तुम
एक पल ढलको तो कभी..

जलती कहीं चिलमनें होंगी
घुंघरुओं की आब तले
दर्द की धुनों में सिसकियाँ
एक पल सुनो तो कभी

ढल रही एक शाम सी
सुबह का आगाज़ लिए
चल पड़ी ये दुनिया भी है
एक पल जियो तो कभी...

बादलों में रुसवा चाँद से
छुप गए हो तुम कहीं
रमज़ान का वास्ता तुम्हे
एक पल दिखो तो कभी...

-जिजीविषा

Tuesday, 25 June 2013

खुद की खुशी ... खुदखुशी

खुदखुशी की उसने
क्या.. !!
यकीन नहीं होता..
आग लगा डाली..!!

हाँ लगा दी होगी सचमुच
जला दी होंगी उसने
वो बचपन की यादें,
उन पगडंडियों में दौड़ने की खुशी,
वो सावन के झूले,
आम की कच्ची कौरें..
भुला दी होगी उसने
स्कूली बस्ते की किताबों में सूखे टेसू के फूलों की खुशबू,
कर दिए होंगे किनारे
उन सात फेरों के
सब वादे..
बड़ी ही सुलझी हुई, समझदार थी, नेक थी वो तो
फिर क्या हुआ ?
नेक थी तो क्या
थी तो लड़की ही .....

क्या बात करते हो तुम ..
जाओ
उसे तो
अवसादों ,चिंताओं,लोगों ने ..
समाज ने मारा ..
खुद की खुशी भला कभी हुई खुदखुशी ? ? ?

Monday, 24 June 2013

सफर का मोड़

<3 हम तुम <3

मिले थे उस सफर पर
हँसे ,चले फिर साथ साथ
एक क्षण पास होने का एहसास भी हुआ
और
बिखर भी गया
उस दिशा पर उस मोड़ से 
जहाँ से
तुम भी चल दिए
हम भी गुजर गए ....

(जिजीविषा)

Monday, 17 June 2013

........ माँ.!! ये तुम्हारे लिए ..... ........क्यूंकि तुम हो बस मेरे लिए ....

लिया जन्म,
जब पग पहला बढ़ाया
लडखडाई मैं गिरती पड़ती
उठी सम्भली चली मैं
तुम्हारा हाथ सहारे को पाया..
जब चोट लगी
कुहनी छिली..
अश्रुओं से जब हर्षित मन मुरझाया
तब तुम ही थी माँ
जिसने मुझे समझाया
ये जीवन है कठिन मार्ग,
चलना है तुम्हे अनवरत
कुंठित ना होना बस प्रयास रखना भरसक
क्यूंकि
चमकोगी नहीं तब तक, सूरज सा जलोगी नहीं जब तक .. !!

बचपन बीता, यौवन गुज़रा
परम्पराओं के निर्वहन में
देखी अपनी अवहेलना
अवसादों में बही मैं
झाझावातों से भी उलझी
सवान से पतझड़ हुई मैं
नारी हूँ मैं , कोमल मन छुईमुई सा
डरी भी, भयभीत हुई उस नर से
रुकी, ठहरी ,पर फिर भी चली मैं
क्यूंकि तुम कहती हो
जीतोगी नहीं तब तक, संघर्ष करोगी नहीं जब तक ..!!

तुम साथ हो मेरे
मैं नहीं भयभीत उन् अंधेरों से
लड़की हूँ तो क्या
तुम्हारा मान हूँ मैं
जियूंगी यह जीवन अपना
अपनी शर्तों पर
अब ना बाधेंगी अब
पैरों की पायलें
ना जकड़ेगी
इन हाथों की चूडियाँ
स्वछन्द हवाओं में
विचरुंगी मैं
बनूँगी भाग्यविधाता
स्वयं के भाग्य की
लिखूंगी
एक स्वर्णिम इतिहास

क्यूंकि
याद है मुझे बचपन की वो बात
जो कही थी तुमने ने उस रात

हारोगी नहीं तब तक, हार नहीं मानोगी जब तक .. !!

(जिजीविषा)

अतृप्त मन

गुजरी शाम
एकाकीपन में,
हाथ में चाय की प्याली थामे
खिड़की के कोने से जब देखी मैंने...
फुहारों की तीव्रता...
महसूस किया,
मानसून की उन् बूंदों में
एक अजब सा स्वर...
धरा से मिलने का उत्साह...
पल्लवित पुष्प
तृप्त लताएँ,
भीगी
मंदिरों की पताकाएं,
मस्जिदों के गुम्बद
ऊँची मीनारें....
दूर तलक जाते,
उन् रास्तों से मन लौट आया
शुब्ध सा
.....
उन नीची दहलीजों पर
बिखरे मिट्टी के दीयों
को भरती वो बूँदें
क्या मेरा मन नही भर सकती
कितने मौसम बदले..
कई मानसून आये और गए..
बवंडरों और तूफानों में
शीशे सा मेरा मन
टूटा ही मगर
भीगा नहीं
आज भी अतृप्त है
कोरा सा...

(जिजीविषा )

Saturday, 15 June 2013

प्रेम-पुष्प

जीवंत है आज भी
स्मृतिओं में
रात की रानी सी
उस निकटता की सुगंधि..
मोहपाश
उस स्पर्श का..
आलिंगन का सम्मोहन..
जब हुआ था अधरों से अधरों का परिचय,
पूर्ण हुई..
समाहित हुई थी..
भुवन में व्याप्त उस प्रेम में,
सकल संसृति से अनविज्ञ
चेतनाशून्य ‘जिजीविषा’..!!

Tuesday, 11 June 2013

आत्ममंथन

स्वयं से स्वयं का परिमार्जन
सिखलाता है...
हद से अनहद तक विस्तृत व्योम..
पच्छिम में डूबता सूरज..
संगम पर मिलती नदियाँ ..
नीड़ों की ओर लौटते खग..

और फिर सहसा
तारसप्तक में बिखरे सुरों सा चंचल मन मेरा
लौटने लगता है शून्य की ओर ...

जिजीविषा स्वयं से स्वयं की ओर....!!

Sunday, 9 June 2013

तुम मेरे मूर्तिकार

कई सोचे...कई उलझे... कई चाहे .. कई बस छू कर निकल गए ..
संगेमरमर की पर्त सा "मेरा मन"

पर एक तुम ही मिले जो तराशे मुझे...!!

Saturday, 25 May 2013

जिजीविषा : मेरी अंतरिम प्रेरणा

समर्पित... तुम्हे... !!
मेरी अंतरिम प्रेरणा

जीवन की दुखद चोटों को को धागे से सीलती,
अनुभवों को बुनती..
तरसती मैं ..
उन हंसते दिनों की याद को ...
उन् मंदिरों में की ... उस फ़रियाद को..
एक साथ को..
गुजरी उस रात को...
मन में ज्वार
उठता सा झंझावात..
कुछ बातें, कुछ जज़्बात,
कुछ यादें और कुछ अलफ़ाज़..
सुनो मुझे...
मैं कुछ कहना चाहती हूँ..

एक शाश्वत सत्य, प्रकृति का उन्माद हूँ मैं ..
हुंकार हूँ ,अज्ञात हूँ एक आवाज़ हूँ मैं...!!


(जिजीविषा)