स्वयं से स्वयं का परिमार्जन
सिखलाता है...
हद से अनहद तक विस्तृत व्योम..
पच्छिम में डूबता सूरज..
संगम पर मिलती नदियाँ ..
नीड़ों की ओर लौटते खग..
और फिर सहसा
तारसप्तक में बिखरे सुरों सा चंचल मन मेरा
लौटने लगता है शून्य की ओर ...
जिजीविषा स्वयं से स्वयं की ओर....!!
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