Tuesday, 25 June 2013

खुद की खुशी ... खुदखुशी

खुदखुशी की उसने
क्या.. !!
यकीन नहीं होता..
आग लगा डाली..!!

हाँ लगा दी होगी सचमुच
जला दी होंगी उसने
वो बचपन की यादें,
उन पगडंडियों में दौड़ने की खुशी,
वो सावन के झूले,
आम की कच्ची कौरें..
भुला दी होगी उसने
स्कूली बस्ते की किताबों में सूखे टेसू के फूलों की खुशबू,
कर दिए होंगे किनारे
उन सात फेरों के
सब वादे..
बड़ी ही सुलझी हुई, समझदार थी, नेक थी वो तो
फिर क्या हुआ ?
नेक थी तो क्या
थी तो लड़की ही .....

क्या बात करते हो तुम ..
जाओ
उसे तो
अवसादों ,चिंताओं,लोगों ने ..
समाज ने मारा ..
खुद की खुशी भला कभी हुई खुदखुशी ? ? ?

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