जीवंत है आज भी
स्मृतिओं में
रात की रानी सी
उस निकटता की सुगंधि..
मोहपाश
उस स्पर्श का..
आलिंगन का सम्मोहन..
जब हुआ था अधरों से अधरों का परिचय,
पूर्ण हुई..
समाहित हुई थी..
भुवन में व्याप्त उस प्रेम में,
सकल संसृति से अनविज्ञ
चेतनाशून्य ‘जिजीविषा’..!!
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