Monday, 23 January 2017

अधूरी कहानी का शीर्षक नहीं होता


बात उन बीते सालों की है जब जवानी में उनके आसमां का रंग गुलाबी हुआ करता था, हवाएं खुशबुओं में उड़ा करती थीं और पानी चांदनी पिया करता था।

अपनी शहद भरी आँखों में आधा काजल लगाने वाली उस लड़की के मन में अनंत उत्साह था आसमां छू लेने का, अपने छोटे क़दमों से दुनिया समेटने का।उसके ऊपरी होंठ के बाएं सिरे पर बना वो छोटा तिल उसकी मनमानियों का वाकया था जिसे उस लड़के को वो हर रात सुनाती थी। उन रातों को जब आँखें मूँद कर तारों की ओट में उस लड़के से वो बातें किया करती थीं तब आँगन की मुंडेर पर मधुमती दरवाज़े से लिपट जाया करती।

मूछों से बड़ी दाढ़ी रखने वाले उस लड़के को मनोविज्ञान बिलकुल पसंद नहीं था पर था वो फिर भी झरने सी संजीदगी से भरा हुआ। नाक पर टिके ऐनक की कान पर पड़ती लकीर की तरह उस लड़की को भी वी हमेशा के लिए अपने संग गढ़ लेना चाहता था। 


उन दोनों का पुष्पपल्लवन रात की रानी सा सम्मोहित करने वाला था और विश्वास पवित्र तुलसी के बिरवा सा जाति के बंधन से दूर उनके उस लीपे हुए आँगन में उगने वाला।
कोहरे भरी भोर, टिपटिपाती बारिश और हाड़ कंपाती ठण्ड के बीच दो सुदूर शहरों के खुले आसमां के नीचे बलवती होती उनकी कहानी उनकी ये नहीं जानती थी कि किस वर्ण में पैदा हुई है।
बहुत भोले जन थे चन्दन सी खुशबु में भीगे हुए दोनों, सफ़ेद घोड़ों में बादलों तक जाया करते थे।


सालों साल, रातों के पहरों में गुम हो गए ।

आसमां बीते सालों कुछ सुर्ख हो गया, खुशबु कुछ हवाओं की पक सी गयी और कहते हैं कि लड़की के सपने अब कुछ जनवरी की धुंध में ढलकने लगे थे, होंठ पर उस छोटे तिल की चमक भी अब फीकी पड़ गयी थी।
लड़के को पहले के मुकाबले मनोविज्ञान से अब ज़्यादा चिढ़ थी, वो नहीं जानता था फ्रायड की बातें की जब कोई किसी अपने से बेहद रूठ जाता है तब गाहे बगाहे उसी शख्स से परवाह की उम्मीद भी रखता है। जिसके लिए अकेले में मायूस होता होगा उसके लिए कितना संवेदनशील और भावुक होगा उसके एक दिल का एक सफ़ा।
दिन भर सीखे सबक पूस और माघ की रातों में वो गर्माहट रखने के लिए भून देता, कोशिश फिर भी बहुत किया करता था।

वक्त की चाल कहिये या ज़िन्दगी की बेरहमी।

उस रात लड़के ने एक ऐसी बात कह दी जिससे लड़की का पहाड़ सा दिल बैठ गया। वो कुरेदता रहा और वो कमज़ोर सीवन सी उधड़ती रही |
कमरे की उस रोमन घड़ी ने उस रात 2.30 बजाए थे तब, एक क्षण आया औ' सपने सब रुख्सार से मोती के जैसे बिस्तर पर बिखरने लगे, पतझर में झरने वाले पात की तरह उसकी देह में अब कुछ न बचा था।
वो लड़की उस रात अपने सारे मोती लुटा चुकी थी।
रोमन के उन अंकों में थमा समय अब दिखा रहा था कि वो पगली अब और चांदनी न पी सकेगी, मस्ज़िद से आने वाली फज़र की अज़ान शायद उस दिन यही पैगाम दे रही थी,
*लकुम दीनेकुम वले यदीन*
(तुम्हे तुम्हारा दीन मुबारक, उन्हें उनका)।

भोर के उस धुंधकले तारे को देखती उन टूटती आँखों के ख़ारे पानी से उसके आँगन की मधुमती उस रोज़ हमेशा के लिए अलसा गयी...
-जिजीविषा
© Pragya Bahuguna

Saturday, 16 May 2015

"तुम"
भूमध्य रेखा सरे मेरे अस्तित्व के दोनों गोलार्धों को जोड़ते
न जाने कब कर्क और मकर हो गये ..
तुम संभवतः जानते थे
"ध्रुवों में आकर्षण सार्थक है"
लेकिन मेल और एकरूपता संभव नहीं ..
जानते हो ...
वायुमंडल की परतों सी तुम्हारी छत्रछाया में अब
पराबैंगनी किरणों ने सेंध मार ली है
चले आओ कि
तुम्हारा आधारबिम्ब हट जाने पर
मेरा विराट हिमालय पिघने लगा है,
मेरी जाति का अस्तित्व खतरे में है..
-जिजीविषा 

 © Pragya Bahuguna

Wednesday, 28 May 2014

यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है

 उठ चला तू विजयपथ पर
रक्तरंजित है धरा,
थरथराते व्यथित पगों पर
विश्लेषणों की वंचना  ..
बह समर वज्रपात सा
प्रखर सूर्य तू उग रहा,
आरम्भ प्रचंड-वीर, दमनशील, तू अतातीत है..
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |

कुटिल उन्माद शंखनाद कर,
संतोष नहीं तू रोष धरे
सिर काट काट,
भुजदंड पाट पाट,
शोणित से असि की प्यास हरे..
तू ही रणचंडी पिपासा, तू रणयोद्धा, तू रणगीत है,
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |

रुण्ड- वितुण्ड- मुंड
क्रंदन कोलाहल कल-कल,
मृत्यु निष्पक्ष - एक प्यास प्रबल..
श्वासों में तेरे स्वर अविरल..
तू समग्र भीष्म, रिपुजीत, तू विश्वमीत है,
यही तेरा युद्ध है, यही तेरी जीत है |

-जिजीविषा
(२८ . ५. २०१४ )



© Pragya Bahuguna

Saturday, 19 April 2014

[ DYING YET TRYING ]

© Pragya Bahuguna


O..Healer..!!
Crawling into blood
Deep inside slaughtered, I am dying
Discerning my veins in search of bliss
For a mother's intuitions I am trying.

Running off Fearsome Vicinity,
Drenched in sweat, thirsty I am flying.
Striving hard, shading truth behind lies,
For the unpaid debt to creator, I am trying.
Blow off fog of thy grey world,
Out my sheer despair to you I am crying.
Despite destitution, complication, botheration,
A youth's exuberance for her mater..
YES, I AM .. I AM TRYING..

-Jijivisha
(Originally written on: January 24, 2014)