Saturday, 16 May 2015

"तुम"
भूमध्य रेखा सरे मेरे अस्तित्व के दोनों गोलार्धों को जोड़ते
न जाने कब कर्क और मकर हो गये ..
तुम संभवतः जानते थे
"ध्रुवों में आकर्षण सार्थक है"
लेकिन मेल और एकरूपता संभव नहीं ..
जानते हो ...
वायुमंडल की परतों सी तुम्हारी छत्रछाया में अब
पराबैंगनी किरणों ने सेंध मार ली है
चले आओ कि
तुम्हारा आधारबिम्ब हट जाने पर
मेरा विराट हिमालय पिघने लगा है,
मेरी जाति का अस्तित्व खतरे में है..
-जिजीविषा 

 © Pragya Bahuguna

1 comment:

  1. एैसी भौगोलिक कविता पहली बार पढ़ी।

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