Thursday, 8 August 2013

ईदी

आओ आओ
आ गए तुम..
पर ये चाँद कहाँ निकला है अभी ?
ये चंद रोज़े तो गुजरने देते
रात के ये पहर तो निकलने देते..
रमज़ान का का वास्ता
बड़ी जल्दी मान लिए तुम
खैर
तुम्हारा ही इंतज़ार था

सच कहा था तुमने
बड़े प्यार से ...
"जब कोई इंसान बेपनाह मुहब्बत करता है 
तो नफरत भी कर सकता है
टकरा के जब खूबसूरत शीशा टूटता है
तो एक हथियार बन जाता है"

जो भी है
है काबिले तारीफ..
पर कुछ ना कहेंगे हम
चाहे जितना कोसो
जितना पूछो 
चुप रहेंगे हमेशा की तरह
क्यूंकि
ईदी में फिर अबके बरस हम
रंजिश ही लेंगे तुमसे...

(जिजीविषा ) - ८ अगस्त २०१३ 
चित्र :गूगल से साभार