उठ चला तू विजयपथ पर
रक्तरंजित है धरा,
थरथराते व्यथित पगों पर
विश्लेषणों की वंचना ..
बह समर वज्रपात सा
प्रखर सूर्य तू उग रहा,
आरम्भ प्रचंड-वीर, दमनशील, तू अतातीत है..
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |
कुटिल उन्माद शंखनाद कर,
संतोष नहीं तू रोष धरे
सिर काट काट,
भुजदंड पाट पाट,
शोणित से असि की प्यास हरे..
तू ही रणचंडी पिपासा, तू रणयोद्धा, तू रणगीत है,
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |
रुण्ड- वितुण्ड- मुंड
क्रंदन कोलाहल कल-कल,
मृत्यु निष्पक्ष - एक प्यास प्रबल..
श्वासों में तेरे स्वर अविरल..
तू समग्र भीष्म, रिपुजीत, तू विश्वमीत है,
यही तेरा युद्ध है, यही तेरी जीत है |
-जिजीविषा
(२८ . ५. २०१४ )
© Pragya Bahuguna
रक्तरंजित है धरा,
थरथराते व्यथित पगों पर
विश्लेषणों की वंचना ..
बह समर वज्रपात सा
प्रखर सूर्य तू उग रहा,
आरम्भ प्रचंड-वीर, दमनशील, तू अतातीत है..
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |
कुटिल उन्माद शंखनाद कर,
संतोष नहीं तू रोष धरे
सिर काट काट,
भुजदंड पाट पाट,
शोणित से असि की प्यास हरे..
तू ही रणचंडी पिपासा, तू रणयोद्धा, तू रणगीत है,
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |
रुण्ड- वितुण्ड- मुंड
क्रंदन कोलाहल कल-कल,
मृत्यु निष्पक्ष - एक प्यास प्रबल..
श्वासों में तेरे स्वर अविरल..
तू समग्र भीष्म, रिपुजीत, तू विश्वमीत है,
यही तेरा युद्ध है, यही तेरी जीत है |
-जिजीविषा
(२८ . ५. २०१४ )
© Pragya Bahuguna

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