Wednesday, 28 May 2014

यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है

 उठ चला तू विजयपथ पर
रक्तरंजित है धरा,
थरथराते व्यथित पगों पर
विश्लेषणों की वंचना  ..
बह समर वज्रपात सा
प्रखर सूर्य तू उग रहा,
आरम्भ प्रचंड-वीर, दमनशील, तू अतातीत है..
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |

कुटिल उन्माद शंखनाद कर,
संतोष नहीं तू रोष धरे
सिर काट काट,
भुजदंड पाट पाट,
शोणित से असि की प्यास हरे..
तू ही रणचंडी पिपासा, तू रणयोद्धा, तू रणगीत है,
यही तेरा युद्ध, यही तेरी जीत है |

रुण्ड- वितुण्ड- मुंड
क्रंदन कोलाहल कल-कल,
मृत्यु निष्पक्ष - एक प्यास प्रबल..
श्वासों में तेरे स्वर अविरल..
तू समग्र भीष्म, रिपुजीत, तू विश्वमीत है,
यही तेरा युद्ध है, यही तेरी जीत है |

-जिजीविषा
(२८ . ५. २०१४ )



© Pragya Bahuguna

Saturday, 19 April 2014

[ DYING YET TRYING ]

© Pragya Bahuguna


O..Healer..!!
Crawling into blood
Deep inside slaughtered, I am dying
Discerning my veins in search of bliss
For a mother's intuitions I am trying.

Running off Fearsome Vicinity,
Drenched in sweat, thirsty I am flying.
Striving hard, shading truth behind lies,
For the unpaid debt to creator, I am trying.
Blow off fog of thy grey world,
Out my sheer despair to you I am crying.
Despite destitution, complication, botheration,
A youth's exuberance for her mater..
YES, I AM .. I AM TRYING..

-Jijivisha
(Originally written on: January 24, 2014)

Saturday, 14 September 2013

हिंदवासिओं का हिंदी दिवस

हिंदी  ..!!
कहाँ छिपी हो तुम ?
सुनो ना ..भूली हुई सी आज याद आ रही हो सबको..
टूटे शीशों से वर्तमान के आईने में देखो ज़रा अपना स्वरुप ..
डर नहीं लगता तुम्हे,
ये कैसा वेश है तुम्हारा, ये भयावह चेहरा ..
तुम्हारा  अस्तित्व,
गुम  गया अपने ही घर में ..
पुनीता से पतीता हो गई हो.
अपने ही समाज में,
तुम भी उन बाँझ स्त्रिओं सी ही हो,
जिन्हें  अपनाया तो लक्ष्मी की  तरह जाता है..
पर बहिष्कृत किया जाता है फलित ना होने पर ..
परम्परावादी परिपाटी पर चलती तुम,
आखिर बंधवा ही गई कोख अपनी ..
एक दिन में सिमटी हुई तुम भूल गई अपना परिचय ..
खैर. ...
संवेदनाओं में ही सही ,
मुबारक हो तुम्हें..
तुम्हारे ही हिंद देश में ,
तुम्हारे ही हिन्द्वासिओं का ,
तुम्हारा ही दिवस,

"हिंदी दिवस"....

१४. ९. २०१३
........प्रज्ञा .........
चित्र :गूगल से साभार
© Pragya Bahuguna

Thursday, 8 August 2013

ईदी

आओ आओ
आ गए तुम..
पर ये चाँद कहाँ निकला है अभी ?
ये चंद रोज़े तो गुजरने देते
रात के ये पहर तो निकलने देते..
रमज़ान का का वास्ता
बड़ी जल्दी मान लिए तुम
खैर
तुम्हारा ही इंतज़ार था

सच कहा था तुमने
बड़े प्यार से ...
"जब कोई इंसान बेपनाह मुहब्बत करता है 
तो नफरत भी कर सकता है
टकरा के जब खूबसूरत शीशा टूटता है
तो एक हथियार बन जाता है"

जो भी है
है काबिले तारीफ..
पर कुछ ना कहेंगे हम
चाहे जितना कोसो
जितना पूछो 
चुप रहेंगे हमेशा की तरह
क्यूंकि
ईदी में फिर अबके बरस हम
रंजिश ही लेंगे तुमसे...

(जिजीविषा ) - ८ अगस्त २०१३ 
चित्र :गूगल से साभार