Thursday, 8 August 2013

ईदी

आओ आओ
आ गए तुम..
पर ये चाँद कहाँ निकला है अभी ?
ये चंद रोज़े तो गुजरने देते
रात के ये पहर तो निकलने देते..
रमज़ान का का वास्ता
बड़ी जल्दी मान लिए तुम
खैर
तुम्हारा ही इंतज़ार था

सच कहा था तुमने
बड़े प्यार से ...
"जब कोई इंसान बेपनाह मुहब्बत करता है 
तो नफरत भी कर सकता है
टकरा के जब खूबसूरत शीशा टूटता है
तो एक हथियार बन जाता है"

जो भी है
है काबिले तारीफ..
पर कुछ ना कहेंगे हम
चाहे जितना कोसो
जितना पूछो 
चुप रहेंगे हमेशा की तरह
क्यूंकि
ईदी में फिर अबके बरस हम
रंजिश ही लेंगे तुमसे...

(जिजीविषा ) - ८ अगस्त २०१३ 
चित्र :गूगल से साभार

Friday, 26 July 2013

बस एक पल कभी

चल रहे उन रास्तों पर
मंजिल है अब दूर कहीं
सफर की थकन मिटे
एक पल तो रुको तो कभी..

होश में दुनिया है सारी
महखानों की जाने राजा है क्या
जाम के नशे में तुम
एक पल ढलको तो कभी..

जलती कहीं चिलमनें होंगी
घुंघरुओं की आब तले
दर्द की धुनों में सिसकियाँ
एक पल सुनो तो कभी

ढल रही एक शाम सी
सुबह का आगाज़ लिए
चल पड़ी ये दुनिया भी है
एक पल जियो तो कभी...

बादलों में रुसवा चाँद से
छुप गए हो तुम कहीं
रमज़ान का वास्ता तुम्हे
एक पल दिखो तो कभी...

-जिजीविषा

Tuesday, 25 June 2013

खुद की खुशी ... खुदखुशी

खुदखुशी की उसने
क्या.. !!
यकीन नहीं होता..
आग लगा डाली..!!

हाँ लगा दी होगी सचमुच
जला दी होंगी उसने
वो बचपन की यादें,
उन पगडंडियों में दौड़ने की खुशी,
वो सावन के झूले,
आम की कच्ची कौरें..
भुला दी होगी उसने
स्कूली बस्ते की किताबों में सूखे टेसू के फूलों की खुशबू,
कर दिए होंगे किनारे
उन सात फेरों के
सब वादे..
बड़ी ही सुलझी हुई, समझदार थी, नेक थी वो तो
फिर क्या हुआ ?
नेक थी तो क्या
थी तो लड़की ही .....

क्या बात करते हो तुम ..
जाओ
उसे तो
अवसादों ,चिंताओं,लोगों ने ..
समाज ने मारा ..
खुद की खुशी भला कभी हुई खुदखुशी ? ? ?

Monday, 24 June 2013

सफर का मोड़

<3 हम तुम <3

मिले थे उस सफर पर
हँसे ,चले फिर साथ साथ
एक क्षण पास होने का एहसास भी हुआ
और
बिखर भी गया
उस दिशा पर उस मोड़ से 
जहाँ से
तुम भी चल दिए
हम भी गुजर गए ....

(जिजीविषा)

Monday, 17 June 2013

........ माँ.!! ये तुम्हारे लिए ..... ........क्यूंकि तुम हो बस मेरे लिए ....

लिया जन्म,
जब पग पहला बढ़ाया
लडखडाई मैं गिरती पड़ती
उठी सम्भली चली मैं
तुम्हारा हाथ सहारे को पाया..
जब चोट लगी
कुहनी छिली..
अश्रुओं से जब हर्षित मन मुरझाया
तब तुम ही थी माँ
जिसने मुझे समझाया
ये जीवन है कठिन मार्ग,
चलना है तुम्हे अनवरत
कुंठित ना होना बस प्रयास रखना भरसक
क्यूंकि
चमकोगी नहीं तब तक, सूरज सा जलोगी नहीं जब तक .. !!

बचपन बीता, यौवन गुज़रा
परम्पराओं के निर्वहन में
देखी अपनी अवहेलना
अवसादों में बही मैं
झाझावातों से भी उलझी
सवान से पतझड़ हुई मैं
नारी हूँ मैं , कोमल मन छुईमुई सा
डरी भी, भयभीत हुई उस नर से
रुकी, ठहरी ,पर फिर भी चली मैं
क्यूंकि तुम कहती हो
जीतोगी नहीं तब तक, संघर्ष करोगी नहीं जब तक ..!!

तुम साथ हो मेरे
मैं नहीं भयभीत उन् अंधेरों से
लड़की हूँ तो क्या
तुम्हारा मान हूँ मैं
जियूंगी यह जीवन अपना
अपनी शर्तों पर
अब ना बाधेंगी अब
पैरों की पायलें
ना जकड़ेगी
इन हाथों की चूडियाँ
स्वछन्द हवाओं में
विचरुंगी मैं
बनूँगी भाग्यविधाता
स्वयं के भाग्य की
लिखूंगी
एक स्वर्णिम इतिहास

क्यूंकि
याद है मुझे बचपन की वो बात
जो कही थी तुमने ने उस रात

हारोगी नहीं तब तक, हार नहीं मानोगी जब तक .. !!

(जिजीविषा)