Saturday, 19 April 2014

[ DYING YET TRYING ]

© Pragya Bahuguna


O..Healer..!!
Crawling into blood
Deep inside slaughtered, I am dying
Discerning my veins in search of bliss
For a mother's intuitions I am trying.

Running off Fearsome Vicinity,
Drenched in sweat, thirsty I am flying.
Striving hard, shading truth behind lies,
For the unpaid debt to creator, I am trying.
Blow off fog of thy grey world,
Out my sheer despair to you I am crying.
Despite destitution, complication, botheration,
A youth's exuberance for her mater..
YES, I AM .. I AM TRYING..

-Jijivisha
(Originally written on: January 24, 2014)

Saturday, 14 September 2013

हिंदवासिओं का हिंदी दिवस

हिंदी  ..!!
कहाँ छिपी हो तुम ?
सुनो ना ..भूली हुई सी आज याद आ रही हो सबको..
टूटे शीशों से वर्तमान के आईने में देखो ज़रा अपना स्वरुप ..
डर नहीं लगता तुम्हे,
ये कैसा वेश है तुम्हारा, ये भयावह चेहरा ..
तुम्हारा  अस्तित्व,
गुम  गया अपने ही घर में ..
पुनीता से पतीता हो गई हो.
अपने ही समाज में,
तुम भी उन बाँझ स्त्रिओं सी ही हो,
जिन्हें  अपनाया तो लक्ष्मी की  तरह जाता है..
पर बहिष्कृत किया जाता है फलित ना होने पर ..
परम्परावादी परिपाटी पर चलती तुम,
आखिर बंधवा ही गई कोख अपनी ..
एक दिन में सिमटी हुई तुम भूल गई अपना परिचय ..
खैर. ...
संवेदनाओं में ही सही ,
मुबारक हो तुम्हें..
तुम्हारे ही हिंद देश में ,
तुम्हारे ही हिन्द्वासिओं का ,
तुम्हारा ही दिवस,

"हिंदी दिवस"....

१४. ९. २०१३
........प्रज्ञा .........
चित्र :गूगल से साभार
© Pragya Bahuguna

Thursday, 8 August 2013

ईदी

आओ आओ
आ गए तुम..
पर ये चाँद कहाँ निकला है अभी ?
ये चंद रोज़े तो गुजरने देते
रात के ये पहर तो निकलने देते..
रमज़ान का का वास्ता
बड़ी जल्दी मान लिए तुम
खैर
तुम्हारा ही इंतज़ार था

सच कहा था तुमने
बड़े प्यार से ...
"जब कोई इंसान बेपनाह मुहब्बत करता है 
तो नफरत भी कर सकता है
टकरा के जब खूबसूरत शीशा टूटता है
तो एक हथियार बन जाता है"

जो भी है
है काबिले तारीफ..
पर कुछ ना कहेंगे हम
चाहे जितना कोसो
जितना पूछो 
चुप रहेंगे हमेशा की तरह
क्यूंकि
ईदी में फिर अबके बरस हम
रंजिश ही लेंगे तुमसे...

(जिजीविषा ) - ८ अगस्त २०१३ 
चित्र :गूगल से साभार

Friday, 26 July 2013

बस एक पल कभी

चल रहे उन रास्तों पर
मंजिल है अब दूर कहीं
सफर की थकन मिटे
एक पल तो रुको तो कभी..

होश में दुनिया है सारी
महखानों की जाने राजा है क्या
जाम के नशे में तुम
एक पल ढलको तो कभी..

जलती कहीं चिलमनें होंगी
घुंघरुओं की आब तले
दर्द की धुनों में सिसकियाँ
एक पल सुनो तो कभी

ढल रही एक शाम सी
सुबह का आगाज़ लिए
चल पड़ी ये दुनिया भी है
एक पल जियो तो कभी...

बादलों में रुसवा चाँद से
छुप गए हो तुम कहीं
रमज़ान का वास्ता तुम्हे
एक पल दिखो तो कभी...

-जिजीविषा

Tuesday, 25 June 2013

खुद की खुशी ... खुदखुशी

खुदखुशी की उसने
क्या.. !!
यकीन नहीं होता..
आग लगा डाली..!!

हाँ लगा दी होगी सचमुच
जला दी होंगी उसने
वो बचपन की यादें,
उन पगडंडियों में दौड़ने की खुशी,
वो सावन के झूले,
आम की कच्ची कौरें..
भुला दी होगी उसने
स्कूली बस्ते की किताबों में सूखे टेसू के फूलों की खुशबू,
कर दिए होंगे किनारे
उन सात फेरों के
सब वादे..
बड़ी ही सुलझी हुई, समझदार थी, नेक थी वो तो
फिर क्या हुआ ?
नेक थी तो क्या
थी तो लड़की ही .....

क्या बात करते हो तुम ..
जाओ
उसे तो
अवसादों ,चिंताओं,लोगों ने ..
समाज ने मारा ..
खुद की खुशी भला कभी हुई खुदखुशी ? ? ?