Monday, 17 June 2013

........ माँ.!! ये तुम्हारे लिए ..... ........क्यूंकि तुम हो बस मेरे लिए ....

लिया जन्म,
जब पग पहला बढ़ाया
लडखडाई मैं गिरती पड़ती
उठी सम्भली चली मैं
तुम्हारा हाथ सहारे को पाया..
जब चोट लगी
कुहनी छिली..
अश्रुओं से जब हर्षित मन मुरझाया
तब तुम ही थी माँ
जिसने मुझे समझाया
ये जीवन है कठिन मार्ग,
चलना है तुम्हे अनवरत
कुंठित ना होना बस प्रयास रखना भरसक
क्यूंकि
चमकोगी नहीं तब तक, सूरज सा जलोगी नहीं जब तक .. !!

बचपन बीता, यौवन गुज़रा
परम्पराओं के निर्वहन में
देखी अपनी अवहेलना
अवसादों में बही मैं
झाझावातों से भी उलझी
सवान से पतझड़ हुई मैं
नारी हूँ मैं , कोमल मन छुईमुई सा
डरी भी, भयभीत हुई उस नर से
रुकी, ठहरी ,पर फिर भी चली मैं
क्यूंकि तुम कहती हो
जीतोगी नहीं तब तक, संघर्ष करोगी नहीं जब तक ..!!

तुम साथ हो मेरे
मैं नहीं भयभीत उन् अंधेरों से
लड़की हूँ तो क्या
तुम्हारा मान हूँ मैं
जियूंगी यह जीवन अपना
अपनी शर्तों पर
अब ना बाधेंगी अब
पैरों की पायलें
ना जकड़ेगी
इन हाथों की चूडियाँ
स्वछन्द हवाओं में
विचरुंगी मैं
बनूँगी भाग्यविधाता
स्वयं के भाग्य की
लिखूंगी
एक स्वर्णिम इतिहास

क्यूंकि
याद है मुझे बचपन की वो बात
जो कही थी तुमने ने उस रात

हारोगी नहीं तब तक, हार नहीं मानोगी जब तक .. !!

(जिजीविषा)

अतृप्त मन

गुजरी शाम
एकाकीपन में,
हाथ में चाय की प्याली थामे
खिड़की के कोने से जब देखी मैंने...
फुहारों की तीव्रता...
महसूस किया,
मानसून की उन् बूंदों में
एक अजब सा स्वर...
धरा से मिलने का उत्साह...
पल्लवित पुष्प
तृप्त लताएँ,
भीगी
मंदिरों की पताकाएं,
मस्जिदों के गुम्बद
ऊँची मीनारें....
दूर तलक जाते,
उन् रास्तों से मन लौट आया
शुब्ध सा
.....
उन नीची दहलीजों पर
बिखरे मिट्टी के दीयों
को भरती वो बूँदें
क्या मेरा मन नही भर सकती
कितने मौसम बदले..
कई मानसून आये और गए..
बवंडरों और तूफानों में
शीशे सा मेरा मन
टूटा ही मगर
भीगा नहीं
आज भी अतृप्त है
कोरा सा...

(जिजीविषा )

Saturday, 15 June 2013

प्रेम-पुष्प

जीवंत है आज भी
स्मृतिओं में
रात की रानी सी
उस निकटता की सुगंधि..
मोहपाश
उस स्पर्श का..
आलिंगन का सम्मोहन..
जब हुआ था अधरों से अधरों का परिचय,
पूर्ण हुई..
समाहित हुई थी..
भुवन में व्याप्त उस प्रेम में,
सकल संसृति से अनविज्ञ
चेतनाशून्य ‘जिजीविषा’..!!

Tuesday, 11 June 2013

आत्ममंथन

स्वयं से स्वयं का परिमार्जन
सिखलाता है...
हद से अनहद तक विस्तृत व्योम..
पच्छिम में डूबता सूरज..
संगम पर मिलती नदियाँ ..
नीड़ों की ओर लौटते खग..

और फिर सहसा
तारसप्तक में बिखरे सुरों सा चंचल मन मेरा
लौटने लगता है शून्य की ओर ...

जिजीविषा स्वयं से स्वयं की ओर....!!

Sunday, 9 June 2013

तुम मेरे मूर्तिकार

कई सोचे...कई उलझे... कई चाहे .. कई बस छू कर निकल गए ..
संगेमरमर की पर्त सा "मेरा मन"

पर एक तुम ही मिले जो तराशे मुझे...!!