गुजरी शाम
एकाकीपन में,
हाथ में चाय की प्याली थामे
खिड़की के कोने से जब देखी मैंने...
फुहारों की तीव्रता...
महसूस किया,
मानसून की उन् बूंदों में
एक अजब सा स्वर...
धरा से मिलने का उत्साह...
पल्लवित पुष्प
तृप्त लताएँ,
भीगी
मंदिरों की पताकाएं,
मस्जिदों के गुम्बद
ऊँची मीनारें....
दूर तलक जाते,
उन् रास्तों से मन लौट आया
शुब्ध सा
.....
उन नीची दहलीजों पर
बिखरे मिट्टी के दीयों
को भरती वो बूँदें
क्या मेरा मन नही भर सकती
कितने मौसम बदले..
कई मानसून आये और गए..
बवंडरों और तूफानों में
शीशे सा मेरा मन
टूटा ही मगर
भीगा नहीं
आज भी अतृप्त है
कोरा सा...
(जिजीविषा )
WonderfWonderful
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ReplyDeleteमन की अभिलाषा है अनंत आकाश में उड़ने की
ReplyDeleteजाने की उन राहो पर खोजा नही है जिन्हें किसी ने
छूने की सागर की अप्रतिम गहराइयों को
फिर मन कैसे होता तृप्त बरखा की उन बूंदों से
जो धरा को तो भिगो सकती है, पर
छू नही पाती अंतर्मन की गहराइयों को